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देख रहा था वह भौचक्का एक जब आया था धक्का भक्तों की भीड़ थी जिसने रोंदा सब, कुछ न रख्खा.
और का स्वर्ग सहती है लार की नदी बहती है शायद उगा कुछ नाबदान में साथ लटकी चमगादड़ कहती है.
सपना जिसे स्वर्ग मिलता है मरकर क्या खुश रहता है? जब लाश पड़ी सड़ती उसकी जैविक चक्र कौन रचता है?
जो सपने मर जाते हैं मर कर कहाँ जाते हैं? कौन पालता है उन्हें जिन्हें वे अनाथ छोड़ जाते हैं?
आँखों के पीछे से सूखी त्वचा  के नीचे से रूखी झाँक रही एक कीट चेतना हरित, क्रमित, रुष्ट और भूखी 
धीरे धीरे फासला बढ़ता रहा धीरे धीरे अजनबी बनता रहा एक रात बिस्तर पर पड़े सावन सारा चुपचाप रिसता रहा.
रात देखे अपने मैले हाथ कटोरी पंजे वाले के साथ कल की सबसे बड़ी ख़ुशी - खूब धो चमकाना अपने हाथ.
तीस का है एक कुँआरा बिल्ली सा मिमियाता है बेचारा हँसता है खुद पर कभी कभी ढूँढ़ता है बेवक्त सहारा.
अपने पंजों में सिर झुकाए सोच रहा था सेंध लगाए काली किस्मत में उसकी, कुछ नहीं था बूट के सिवाए.
एक चूहा कटोरी पंजों वाला खोद रहा था गहरा नाला सुबह तक का समय दो बोला, मेरे खोलते ही ताला.
उसकी रोटी थी कुछ रूठी सुबह की ट्रेन लगभग छूटी खिड़की पर सिर टिकाए मुझे लगी सारी संभावनाएँ ही झूठी
गर्मियों की बारिश में नीली सिगरेट हो गई मेरी गीली धुँआ भी उसका गीला गीला विचार गीले, यादें कुछ सीली.
होटल की चाय हलकी गरम बिस्तर भी नहीं ज्यादा नरम लुटाने तो आँसू ही हैं पालें क्यों पैसों का भरम?
गोद में जब रखकर सिर मूँदी पलकें एक बार फिर अनजाने ही तपता एक आँसू गिरा गाल पर मेरे, थिर.
की वर्षों लंबी नफरत जिससे हाथ मिलाया देर तक उससे बस आखिरी दिन था वह जा रहा था दूर हमसे.
मेरी हथेली कुछ देर जाँचकर कहा उसने उदास सिर हिलाकर कल दिन में आना बेटा बस रातभर में भाग्य बदलकर.
गंध मुद्रित नए पन्नों की ध्वनि उड़ती कुछ रसीदों की फिर से जग उठी मुझमें तलब कड़कते कुछ नोटों की.
सपनों की चिड़ियाएँ उड़ गईं घोंसलों सी आँखें छोड़ गईं न नींद है, न सपने कौवा-झुर्रियाँ तक झड़ गईं.
गाँव - जंगल मिलते हैं जहाँ बच्चे नहीं मिलते अब वहाँ मिल जाया करती हैं अक्सर नंगी, सिर कटी कुछ बोरियाँ.
शवभक्षी कीड़ों की भीड़ उभरती हर चौराहे पर चुपचाप रेंगती जुलूस में आए लोगों को हजारों लाल आँखों से घूरती.