धीरे धीरे फासला बढ़ता रहा
धीरे धीरे अजनबी बनता रहा
एक रात बिस्तर पर पड़े
सावन सारा चुपचाप रिसता रहा.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट