संदेश

अपने पंजों में सिर झुकाए सोच रहा था सेंध लगाए काली किस्मत में उसकी, कुछ नहीं था बूट के सिवाए.
एक चूहा कटोरी पंजों वाला खोद रहा था गहरा नाला सुबह तक का समय दो बोला, मेरे खोलते ही ताला.
उसकी रोटी थी कुछ रूठी सुबह की ट्रेन लगभग छूटी खिड़की पर सिर टिकाए मुझे लगी सारी संभावनाएँ ही झूठी
गर्मियों की बारिश में नीली सिगरेट हो गई मेरी गीली धुँआ भी उसका गीला गीला विचार गीले, यादें कुछ सीली.
होटल की चाय हलकी गरम बिस्तर भी नहीं ज्यादा नरम लुटाने तो आँसू ही हैं पालें क्यों पैसों का भरम?
गोद में जब रखकर सिर मूँदी पलकें एक बार फिर अनजाने ही तपता एक आँसू गिरा गाल पर मेरे, थिर.
की वर्षों लंबी नफरत जिससे हाथ मिलाया देर तक उससे बस आखिरी दिन था वह जा रहा था दूर हमसे.